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Showing posts with the label Hindi poems

एक सार/ Ek saar

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  जीवन का एक सार लिए, कुछ बातों का भार लिए, हम कड़वाहट को पीते हैं, और हंस के जीवन जीते हैं।। कुछ लोग यह जान नहीं पाते, क्या होते हैं रिश्ते नाते, बेवजह की गुत्थमगुत्थी में, वो हारे हैं या जीते हैं।। क्या लाये क्या ले जाओगे, जो बाँटोगे वो पाओगे, कभी-कभी दिल को चुप कर, हम होठों को सीते हैं।। और हंस के जीवन जीते हैं।। Dr. Anshul Saxena 

माँ-बाप (Maa-Baap)

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              माँ-बाप माँ-बाप जिन्हें चलना बोलना सिखाते हैं, क्यों बड़े हो बच्चे उन से ही बड़े हो जाते हैं? जो निःस्वार्थ त्याग कर इनका जीवन बनाते हैं  क्यों उन की परवरिश पर बच्चे सवाल उठाते हैं? जब हम गिर जाते थे,  यही हमें उठाते थे। जब हम रुक जाते थे, यही हमें बढ़ाते थे। बच्चों का यह कहना दिल छलनी कर जाता है, अरे, आपको उठना बैठना भी नहीं आता है। जो बच्चों पे अपना जीवन लुटाते हैं लेते नहीं कुछ बस दुआएं दे जाते हैं उनकी सेवा से बच्चे क्यों हिचकिचाते हैं? उनके जीवन कैसे निजी हो जाते हैं? वो कभी नहीं थके, ताकि हम हँस सकें। वो कभी नहीं रुके, ताकि हम बढ़ सकें। उनका दिल बार-बार तार-तार हो जाता है, जब बच्चे कहें आपको इतना भी नहीं आता है। माँ-बाप का किया तो फ़र्ज बताते हैं, जो खुद करें उसे बार-बार जताते हैं। सब कुछ लुटा के जो बच्चों को बनाते हैं, क्यों वो ही दर-दर की ठोकरें खाते हैं? संभल जाओ लाडलों वक़्त है अभी, एक बार जो गए फिर ना आएंगे कभी, तब तुम समझोगे जुदाई क्या है? पूछते हो आपने किया ही क्या है? माँ-बाप  क...

दीवाने (Deewane)

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दीवाने (Deewane) कुछ दीवानों को क्यों यकीं नहीं होता, कहते हैं अब कोई इतना हंसी नहीं होता। जुल्फों में जिसकी सावन की घटा हो, लंबा सा पल्लू काँधे से सटा हो, जो उठा दे निगाहें तो दिल धड़क जाए, छूले ज़रा सा तो शोले दहक जाएं, पहले जो होता था क्यों अब नहीं होता? इन आशिक़ दीवानों को कोई तो समझाए, आते जाते नारी से ये नजरें हटाएं।। नज़ाकत भी है शोखी भी है जैसे कोई ग़ज़ल, कुछ नज़र का फ़ेर है कुछ समय गया बदल, समय बदल गया नारी गई बदल तुम भी बदल जाओ और जाओ अब संभल, दिल को संभालो ज़रा ना जाए ये फ़िसल मिल जाएगा सबक अगर तुम गए मचल। हां, अब तक जो होता आया वह अब नहीं होता। पर ऐसा नहीं कि अब कोई हंसी नहीं होता।।

क़त्ल (Katl)

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 क़त्ल (Katl) बाहर शोर और मेला है, अंदर मन मौन अकेला है, जब अंदर यह घबराता है, एक खंजर खून बहाता है। रोक लो खून को बहने से, अपनों को घायल होने से, अनजाने में अपनों का कोई, अपना कातिल बन जाता है।। कोई भरा हुआ है भावों से, बस भावुक सा हो जाता है, तुम ना समझे तो क्या होगा, यह सोच के वो कतराता है।। थोड़ा हंस लो थोड़ा सह लो, कुछ वो कह दे कुछ तुम कह लो, किसका क्या चला जाता है, ग़र इक जीवन बच जाता है।।

सासू माँ

मेरे अल्हड़पन को गले से लगाना, बातों पर मेरी मुस्कुराते जाना, ना झल्लाना ना चिल्लाना, गलतियों को भी प्यार से बताना। कर्म भी पूजें धर्म भी पूजें, हर रिश्ते को प्यार से सीचें, सौम्य व्यवहार से सबको खींचे, अपनापन कोई इनसे सीखें।। बोली में जैसे मिश्री हो घोली, अनूठा व्यक्तित्व जैसे रंगोली, त्योहार हैं इनसे दिवाली या होली, प्यार से भरती सबकी झोली।। सहनशीलता का रूप है जो, ममता का अतुल स्वरूप है वो, आंचल में जिसके स्नेह का जहां है, वो कोई और नहीं मेरी सासू मां है।। Dr. Anshul Saxena 

माँ (Maa)

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माँ पापड़ चिप्स बड़ी अचार, मां के हाथ में स्वाद हजार, दुनिया का कोई बाजार, बेच ना पाए मां का प्यार। वो सिर पर हथेली, वो पूजा की थाली, मां की दुआएं, जाती न खाली। ममता की महिमा तो गीता का सार पावन है जैसे हो गंगा की धार।। घर में हो मां तो गले से लगाना उसके हृदय को कभी ना दुखाना। किस्मत से मिलता है मां का दुलार सिर माथे रखना दे खुशियां अपार। चाहे जितना कमा लो लगा लो भंडार ममता का ऋण रहे सब पर उधार।। जीवन में मां, ना मिलेंगी हजार। मां का ही मोल, सब दौलत बेकार। डाॅ. अंशुल सक्सेना  

दूरी और मजबूरी

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आज देश भर में फैल रहे कोरोनावायरस से हुए लॉक डाउन के कारण लोगों में खुद को सुरक्षित रखने का एक डर सा बैठ गया है। सुरक्षा की दृष्टि से रखी जाने वाली दूरी लोगों की मजबूरी भी बनती जा रही है। प्रस्तुत है आज की कविता   दूरी और मजबूरी कोरोना ने कैसा मजबूर कर दिया, अपनों को अपनों से दूर कर दिया। खुद की फिक्र ने बेटे को ऐसा डराया, पिता का भी अंतिम संस्कार न कर पाया, नर्स माँ ने बच्चे को गले नहीं लगाया, कोई रह गया अकेला परिवार से ना मिल पाया, एक बदलाव सोच में जरूर कर दिया। कोरोना ने कैसा मजबूर कर दिया।। खुद से खुद का मिल गया पता, बरसों से जो दबा था सब दिया जता, सच के आईने ने हक़ीकत ये दी बता, पैसे से वक्त कीमती सबको लगा पता, झूठे दिखावों को चकनाचूर कर दिया। कोरोना ने कैसा मजबूर कर दिया।। वो करें पहल उम्मीद ये छोड़ो, जिस राह लगता दिल उस राह दिल मोड़ो, ऊंची अगर अहम की दीवार वो तोड़ो, टूटते और छूटते रिश्तो को अब जोड़ो, ऐसा क्या जिंदगी ने क़सूर कर दिया। कोरोना ने कैसा मजबूर कर दिया।। Dr. Anshul Saxena

परवाह (Parvah)

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आज संपूर्ण विश्व में कोरोना वायरस से फैला संक्रमण चिंता का विषय बना हुआ है। सुरक्षा की दृष्टि से देश भर में किये गये लॉक डाउन से कोई भूख से जूझ रहा है तो कोई अकेलेपन से जूझ रहा है। कोई व्यस्त है तो कोई खालीपन से जूझ रहा है। ऐसे में हम सभी दूर रहते हुए एकजुट रहकर यदि कुछ कर सकते हैं तो वह है परवाह। तो इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत है आज की हिंदी कविता   परवाह यह जीवन रैन बसेरा है, सुख दुख का यहां डेरा है, मर कर तुम साथ चलो ना भले, जीते जी साथ निभा देना।। कहीं परिवारों का मेला है, कोई अपना दूर अकेला है, तुम पास भले ना जा पाओ, पर दूर से साथ निभा देना।। भावों में कोई बह जाए तो तुम बाँध बना देना।। तन से साथ रहो न भले, पर मन से साथ निभा देना।। कहीं तड़प है भूखे पेटों की, कहीं कमी नहीं है नोटों की, जिससे जितना बन पाये, उन भूखों तक पहुंचा देना।। मानवता की खेती का, इस धरती पर जहाँ सूखा हो, प्रेम दया के मेघों को, उस धरती पर बरसा देना।। Dr. Anshul Saxena

अधर्म

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आज की मेरी कविता कोरोना वायरस से फैले संक्रमण के कारण संपूर्ण देश में हुए लॉक डाउन में भी हुई साधुओं की निर्मम हत्या के ऊपर है। यह घटना बहुत ही हृदय विदारक है और मानवता के ऊपर एक प्रश्न चिन्ह है।आख़िर लोग इतने निर्दयी कैसे होते जा रहे हैं? धरती फिर से लाल हो गई, पाप अधर्म के वारों से। फिर मानवता हार गयी, इन निर्मम हत्यारों से।। पत्थर मारें लाठी मारें, कहां मिले अधिकारों से। बिन सुनवाई करें फैसला अपने अत्याचारों से।। Dr. Anshul Saxena

कर्मवीर (Karmveer)

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कर्मवीर (Karmveer) आले को तलवार बना, जो रोज युद्ध सा लड़ते हैं। खुद का जीवन दांव पे रख, जो सब की रक्षा करते हैं। लज्जित होती मानवता जब इन पर पत्थर पड़ते हैं। सम्मान योग्य खाकी वाले जनहित में तत्पर रहते हैं शीश कटे या हाथ कटे, जो मरते दम तक लड़ते हैं। लज्जित होती मानवता जब इन पर पत्थर पड़ते हैं। करो नमन उन वीरों को कर्म से जो ना डिगते हैं। जीवन हित की शपथ ले जो कर्तव्य मार्ग पर बढ़ते हैं। लज्जित होती मानवता जब इन पर पत्थर पड़ते हैं। Dr.Anshul Saxena 

बंटवारा

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अंधेरे को गले लगाते डरते हैं उजियारों से, पीठ में खंजर घोंप रहे हैं छुपे हुए गलियारों से। आजादी आजादी करते  सोच लिए गुलामों की, सीमा पर दुश्मन बेहतर है देश के इन गद्दारों से।। मुल्क़ बाँटते शर्म छोड़कर धर्म के नाम प्रचारों से, अल्लाह मालिक वो ही बचाए, ऐसे अक्ल के मारों से। कौन से हक़ को मांग रहे हो, हिंदुस्तान तुम्हारा है, हिंदुस्तान को बांटने वालों थके नहीं बटवारों से?

धर्म-कर्म

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धर्म-कर्म खड़े अचंभित हुए निरुत्तर ताकतवर इंसान। मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे, आज पड़े वीरान। धर्म का चोला पहन अधर्मी, व्यर्थ बांटते ज्ञान। जैसा कर्म करोगे वैसा, फल देगा भगवान।। हर धर्म पढ़ाये मानवता, हर धर्म का हो सम्मान। धर्म नाम पर स्वार्थ साध, मत फैलाओ अज्ञान। अंधभक्त जो तुम्हें मानते, भटक गए नादान। धर्म तुम्हारी नहीं विरासत, ईश्वर अल्लाह एक समान।।

आह्वान

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            आह्वान ज्वाला में है ज्योति जिसकी, आदि अनंत है शक्ति। जगजननी अंबे दुख हरनी, स्वीकार करो ये भक्ति।। करें आह्वान दीप जलाकर, पावन कर दो धरती। रिपु मूरख ने बहुत सताया, दे दो इन से मुक्ति।।

आशा-ज्योति (Asha - Jyoti)

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देश रहे ना खुला भले, खुला रहे यह मन का द्वार। मंदिर ना जा पाओ भले, मन मंदिर में हो जयकार।। तूफ़ाँ में अब नौका अपनी, कौन करेगा बेड़ा पार? बस कर्म हमारे हाथों में, उसके हाथों में पतवार।। मानव धर्म की सेवा में ही, मानवता का है उद्धार। मिटे संक्रमण हर हृदय से, अच्छाई का हो संचार।। जन-जन की सामूहिक शक्ति, संकट बेला रही पुकार। आशा की ज्योति से मिलकर, जगमग कर दो यह संसार।। Dr. Anshul Saxena

दस्तूर रिश्तों का (Dastoor Rishton ka)

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दस्तूर रिश्तों का (Dastoor Rishton ka) रिश्तों की नरमी के लिये, खुद को तपाया जाता है, छोटे हो या फिर हों बड़े, सबको निभाया जाता है।। जो अकड़ जाता है, खुद में जकड़ जाता है, अपनों का मर्म ताउम्र, ना पकड़ पाता है।। आंकते निकालते औरों की ग़लतियाँ, ख़ुद के आँकलन से मुकर जाता है।। लाख़ दिख़ावा करे वो बन के हितैषी झूठ का मुखौटा मग़र उतर जाता है।। बुराइयां निकालते, झूठ को सच मानते। दूरियों के दलदल में, फ़िसल जाता है।। सच का आइना,  जब  नज़र आता है, वक्त बहुत दूर, गुज़र जाता है।। दूसरों के चश्मे से, ग़र देखते रहे, खुद का नज़रिया,  कब  नज़र आता है।। खोखले रिश्तों का कैसा, हो चला दस्तूर, ग़ैर से पहले अपना ही, बदल जाता है।।

सावधानी हमारा हथियार

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सतर्कता लगातार, सावधानी हमारा हथियार।। चीजें छूते हम हज़ार, हाथ धोना बार बार, थक जाना पर मान ना हार, कोरोना का हो ना वार सतर्कता लगातार सावधानी हमारा हथियार। दूर से ही हाथ जोड़ लो, कोरोना का मुंह तोड़ दो, बनो जागरूक स्वच्छ रहो, लापरवाही छोड़ दो छोड़ो माॅल और बाजार सतर्कता लगातार, सावधानी हमारा हथियार।। डर को मन से हटा दो कुछ लक्षण दिखें तो बता दो समय पे देना सूचना इस समय का है उपचार बैठ गये अगर डर के आगे क्या होगा सरकार? सतर्कता लगातार, सावधानी हमारा हथियार।। भीड़ इकट्ठी मत करना हो अलग-थलग पर सब लड़ना देश सुरक्षा तुम्हारे हाथ हाथ पर हाथ मत धरना हम स्वस्थ रहें ना हों लाचार सतर्कता लगातार, सावधानी हमारा हथियार।। सावधानी हमारा हथियार।। Dr.Anshul Saxena

कोरोना वायरस

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आजकल करोना वायरस का प्रकोप पूरी दुनिया में फैला हुआ है। ऐसे अफरा-तफरी के माहौल में कुछ पंक्तियां अवश्य पढ़ें👇 कोरोना कोरोना अब बस भी करो ना जहां से हो आए वहीं जाके मरो ना। सांप चमगादड़ हम नहीं खाते, नमस्ते हैं करते हम आते जाते, सीधा-साधा देश हमारा, कोई दो रोटी खाता मजदूर बेचारा, कोई तंगी से हारा कोई मंदी से हारा। बख्श दो इन्हें अब बस भी करो ना, जहां से आए हो वही जाके मरो ना।। एक काम तुमने नेक है किया, जो लड़ रहे थे उन्हें एक है किया, अब सब मिलकर तुझ से लड़ेंगे, एक रहे हैं एक रहेंगे।। दुनिया से ले विदा हमें खुशियों से भरो ना, कोरोना कोरोना,अब बस भी करो ना।। इसी कविता को हल्के-फुल्के तौर पर मैंने इस प्रकार व्यक्त किया है👇😊

जीवन (Jivan)

                       जीवन  कितनों को अपने मिले नहीं, कुछ सपने पूरे हुए नहीं। कुछ एक वक्त ही खाते हैं, कुछ बिन छत के सो जाते हैं। जो जीवन भर मायूस रहे, वे जीवन क्या जी पाते हैं। कुछ चंद बची कुछ सांसो में, जीवन क्या बतलाते हैं। भोर सुहानी आई है, 'तुम हो'यह संदेशा लाई है। ईश्वर का आभार करो, सपनों को साकार करो। आशा की सामर्थ्य भरो, जीवन को ना व्यर्थ करो। 🌻😊🙏🌻

समय (Samay)

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     समय (Samay) समय का रोना रोने वालों यदि समय से कर लो काम फिर समय समय ही होगा होगा काम के संग आराम। समय नहीं है कहने वालों ना करो इसे बदनाम समय सभी को मिले बराबर उपयोग तुम्हारा काम। समय का मोल जो समझे  समझो उस के बनते काम जो करता इसकी अनदेखी  उसके बिगड़े बनते काम। समय से सबको दो समय समय पर आओ काम  समय सभी का समय से आता  सबके दाता राम। समय का बनता लेखा-जोखा अच्छे बुरे को सबने देखा सही करो जब सही समय तब समय पर होता नाम। लक्ष्यभेद का लक्ष्य बनाकर हर लक्ष्य को दो अंजाम जीवन भर की भागादौड़ी अंत में मिले विराम।। By Dr.Anshul Saxena

ऐ ज़िंदगी तेरी उम्र बहुत छोटी है

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ऐ ज़िंदगी तेरी उम्र बहुत छोटी है तू कभी हंसती है  तो कभी रोती है ए ज़िंदगी तेरी उम्र बहुत छोटी है। भुला दो सारे शिकवे गिले जो अपने हो उन्हें लगा लो गले जी भर के जी लो आज अभी क्या पता कल मिले ना मिले कल की ना दे ख़बर सपने मग़र बोती है ऐ ज़िंदगी तेरी उम्र बड़ी छोटी है।। किसी से रूठे हो तो उसे मना लो दिल में हो प्यार तो उसे जता दो क्या लिया क्या दिया ये हिसाब छोड़कर जो हो तुम्हारे पास बेहिसाब लुटा दो कर लो अगर क़दर तो आंसू भी मोती है ऐ ज़िंदगी तेरी उम्र बहुत छोटी है।। Dr.Anshul Saxena