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Khwaish ( ख्वाहिश)

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  ये उम्र ढल रही है एक शाम की तरह, मिट ना जाये रेत पर एक नाम की तरह, ख्वाइशों का परिंदा कुछ ऐसे उड़ रहा,  लत हो जैसे जीने की एक जाम की तरह।। Dr. Anshul Saxena 

माँ-बाप (Maa-Baap)

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              माँ-बाप माँ-बाप जिन्हें चलना बोलना सिखाते हैं, क्यों बड़े हो बच्चे उन से ही बड़े हो जाते हैं? जो निःस्वार्थ त्याग कर इनका जीवन बनाते हैं  क्यों उन की परवरिश पर बच्चे सवाल उठाते हैं? जब हम गिर जाते थे,  यही हमें उठाते थे। जब हम रुक जाते थे, यही हमें बढ़ाते थे। बच्चों का यह कहना दिल छलनी कर जाता है, अरे, आपको उठना बैठना भी नहीं आता है। जो बच्चों पे अपना जीवन लुटाते हैं लेते नहीं कुछ बस दुआएं दे जाते हैं उनकी सेवा से बच्चे क्यों हिचकिचाते हैं? उनके जीवन कैसे निजी हो जाते हैं? वो कभी नहीं थके, ताकि हम हँस सकें। वो कभी नहीं रुके, ताकि हम बढ़ सकें। उनका दिल बार-बार तार-तार हो जाता है, जब बच्चे कहें आपको इतना भी नहीं आता है। माँ-बाप का किया तो फ़र्ज बताते हैं, जो खुद करें उसे बार-बार जताते हैं। सब कुछ लुटा के जो बच्चों को बनाते हैं, क्यों वो ही दर-दर की ठोकरें खाते हैं? संभल जाओ लाडलों वक़्त है अभी, एक बार जो गए फिर ना आएंगे कभी, तब तुम समझोगे जुदाई क्या है? पूछते हो आपने किया ही क्या है? माँ-बाप  क...

तानाशाही (Tanashahi)

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  नौकर ये सरकार के या नौकरी सरकारी। गैर कानूनी काम करें कानून के अधिकारी। सरेआम धमकियां देते हैं बन बैठे तानाशाही। न्याय मांगने वालों पर अन्याय हो रहा भारी।।

खुदगर्ज़ (Khudgarz)

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   Khudgarz कर सोच समझकर हाल-ए-दिल बयां, सौदा करेगा फ़िर तेरे दर्द का जहाँ, पीठ चढ़ तेरी जो कद तेरा पूछें, उम्मीद क्या उनसे खुदग़र्ज़ हों जहां।।

दीवाने (Deewane)

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दीवाने (Deewane) कुछ दीवानों को क्यों यकीं नहीं होता, कहते हैं अब कोई इतना हंसी नहीं होता। जुल्फों में जिसकी सावन की घटा हो, लंबा सा पल्लू काँधे से सटा हो, जो उठा दे निगाहें तो दिल धड़क जाए, छूले ज़रा सा तो शोले दहक जाएं, पहले जो होता था क्यों अब नहीं होता? इन आशिक़ दीवानों को कोई तो समझाए, आते जाते नारी से ये नजरें हटाएं।। नज़ाकत भी है शोखी भी है जैसे कोई ग़ज़ल, कुछ नज़र का फ़ेर है कुछ समय गया बदल, समय बदल गया नारी गई बदल तुम भी बदल जाओ और जाओ अब संभल, दिल को संभालो ज़रा ना जाए ये फ़िसल मिल जाएगा सबक अगर तुम गए मचल। हां, अब तक जो होता आया वह अब नहीं होता। पर ऐसा नहीं कि अब कोई हंसी नहीं होता।।

क़त्ल (Katl)

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 क़त्ल (Katl) बाहर शोर और मेला है, अंदर मन मौन अकेला है, जब अंदर यह घबराता है, एक खंजर खून बहाता है। रोक लो खून को बहने से, अपनों को घायल होने से, अनजाने में अपनों का कोई, अपना कातिल बन जाता है।। कोई भरा हुआ है भावों से, बस भावुक सा हो जाता है, तुम ना समझे तो क्या होगा, यह सोच के वो कतराता है।। थोड़ा हंस लो थोड़ा सह लो, कुछ वो कह दे कुछ तुम कह लो, किसका क्या चला जाता है, ग़र इक जीवन बच जाता है।।

असली खुशी (Asli Khushi)

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कहानी :असली खुशी किरदार:  दिवाकर सिन्हा और मोहन यह कहानी दो ऐसे व्यक्तियों पर आधारित है जिनकी सोच एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत थी। एक दिवाकर सिन्हा जो सरकारी अध्यापक हैं। दूसरा मोहन जो एक छोटी सी कंपनी में कोई छोटा मोटा काम करता है।  दिवाकर वर्मा जी कुछ परेशान से अपने घर में इधर-उधर टहलते हुए अपने किसी दोस्त से फोन पर बातचीत करते हुए कहते हैं," अरे यार यह कोरोना ने कहां फंसा दिया? थोड़ी बहुत ट्यूशन आ रही थी वह भी आना बंद हो गई। ना कहीं आ सकते हैं न जा सकते हैं। खुद भी घर में बंद हो गये। इधर मेरी धर्मपत्नी भी इस बात को लेकर काफी परेशान है कि उन को मंदिर जाने को नहीं मिल रहा। और सही बात  भी है पूजा-पाठ के बिना मन को शांति कैसे मिले?" बातचीत में उनके दोस्त ने उधर से कुछ कहा जिसके उत्तर में दिवाकर जी बोले क्या बात कर रहे हो तुम्हारा धंधा भी मंदा हो गया? लाखों का धंधा हजारों में आ गया। पता नहीं कोरोनावायरस क्या क्या दिन दिखाएगा?"  फोन पर बातचीत करते-करते दिवाकर को कुछ संगीत की ध्वनि सुनाई दी जो उन के घर के पीछे बने छोटे से घर से आ रही थी। यह घर मोहन का था जो एक किसी कंपनी म...