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नारी - एक चिंगारी ( Naari Ek Chingari)

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 एक चिंगारी नारी अभिमान की आवाज़ में कभी रीति में रिवाज़ में भक्ति है जो उस नारी को शक्ति जो उस चिंगारी को जितना भी उसे दबाओगे एक ज्वाला को भड़काओगे। उस अंतर्मन में शोर है बस चुप वो ना कमज़ोर है जितना तुम उसे मिटाओगे उतना मजबूत बनाओगे। बचपन में थामा था आंचल वो ही पूरक वो ही संबल तुम उसके बिना अधूरे हो तुम नारी से ही पूरे हो जितना तुम अहम बढ़ाओगे अपना अस्तित्व मिटाओगे। By- Dr.Anshul Saxena 

सासू माँ

मेरे अल्हड़पन को गले से लगाना,
बातों पर मेरी मुस्कुराते जाना,
ना झल्लाना ना चिल्लाना,
गलतियों को भी प्यार से बताना।

कर्म भी पूजें धर्म भी पूजें,
हर रिश्ते को प्यार से सीचें,
सौम्य व्यवहार से सबको खींचे,
अपनापन कोई इनसे सीखें।।

बोली में जैसे मिश्री हो घोली,
अनूठा व्यक्तित्व जैसे रंगोली,
त्योहार हैं इनसे दिवाली या होली,
प्यार से भरती सबकी झोली।।

सहनशीलता का रूप है जो,
ममता का अतुल स्वरूप है वो,
आंचल में जिसके स्नेह का जहां है,
वो कोई और नहीं मेरी सासू मां है।।
Dr. Anshul Saxena 

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