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नारी - एक चिंगारी ( Naari Ek Chingari)

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 एक चिंगारी नारी अभिमान की आवाज़ में कभी रीति में रिवाज़ में भक्ति है जो उस नारी को शक्ति जो उस चिंगारी को जितना भी उसे दबाओगे एक ज्वाला को भड़काओगे। उस अंतर्मन में शोर है बस चुप वो ना कमज़ोर है जितना तुम उसे मिटाओगे उतना मजबूत बनाओगे। बचपन में थामा था आंचल वो ही पूरक वो ही संबल तुम उसके बिना अधूरे हो तुम नारी से ही पूरे हो जितना तुम अहम बढ़ाओगे अपना अस्तित्व मिटाओगे। By- Dr.Anshul Saxena 

एक बाल ( Ek Baal ) Part- 2

 एक बाल (Ek Baal ) Part - 2



Kahani- Ek baal Part-2 @expressionshub.co.in

अब तक आपने पढ़ा

शलभ शर्मा सरकारी नौकरी में कार्यरत एक बहुत ही होनहार परंतु अंतर्मुखी स्वभाव का व्यक्ति था। उम्र से पहले ही झड़ते बालों से हुये गंजेपन के कारण किसी न किसी रूप में कई बार उसके मन को आहत होना पड़ा । कैसे और कब ये जानने के लिये पढ़ें। एक बाल (भाग एक )

अब आगे पढ़ें

सुधा के घर वाले शलभ के जवाब का इंतज़ार कर रहे थे क्योंकि सुधा ने विवाह के लिए हाँ कर दी थी। इस बात ने शलभ को हैरान कर दिया और उसने सुधा से एक बार और बात करने का मन बनाया।

शलभ सुधा से मिला और उसने पूछा, " क्या तुम एक ऐसे इंसान को अपना जीवनसाथी बनाना चाहोगी जिसके सिर पर बाल ना हों?" इस पर सुधा ने कहा, " जीवन साथी वह है जो जीवन भर साथ निभाए। यदि किसी के बाद में बाल चले जाएं तब क्या साथ छोड़ दिया जाएगा?"

इस बात पर शलभ को यह एहसास हुआ की सुधा अन्य लड़कियों से कितनी अलग थी और शायद वह उसके जीवन में एक अलग रंग भर देगी।

अंततः सुधा और शलभ का विवाह हो गया। विवाह के दौरान ही शलभ ने किसी रिश्तेदार को कहते हुए सुना लड़का तो अच्छा है लेकिन अगर उसके सिर पर बाल होते तो कुछ और ही बात होती। शलभ को यह बात चुभी ज़रूर लेकिन  सुधा की मुस्कान के आगे वह सब भूल गया।

अब शलभ की पोस्टिंग किसी अन्य शहर में हो गई थी। सुधा और शलभ दोनों ही वहां हंसी खुशी अपना जीवन बिताने लगे। अक्सर आस-पड़ोस के लड़के लड़कियां शलभ को अंकल और सुधा को दीदी बुलाते थे।

शलभ अपने गंजेपन की कुंठा को चाह कर भी नहीं भुला पाता था। इस गंजेपन को ढ़ाकने के लिए वह किसी कृतिम साधन का उपयोग भी नहीं करना चाहता था। समय बीतता गया। दो साल बीत चुके थे। धीरे धीरे शलभ की यह कुंठा उसकी चिड़चिड़ाहट में परिवर्तित होने लगी। अब शलभ ना ही कोई तस्वीरें खिंचवाना चाहता था और ना ही आईना देखना चाहता था।

एक दिन अचानक से बिस्तर के तकिए पर सुधा के लगे बालों को देख शलभ सुधा पर बुरी तरह चिल्लाने लगा।  "तुम्हें कितनी बार कहा है जब भी अपने बालों को धो तो उन्हें बांध के रखो। मुझे तुम्हारे इधर उधर पड़े बाल बिल्कुल पसंद नहीं।" सुधा ने तुरंत बिस्तर को साफ किया। शलभ के इस बर्ताव से वह काफ़ी हैरान थी। सुधा भी अपने जरूरत से ज्यादा गिरते बालों से परेशान थी। पिछले कुछ दिनों से उसे कमजोरी थी और चक्कर आ रहे थे। लेकिन शलभ के अजीब बर्ताव के कारण वह उसे बता ना सकी।

एक दिन सुबह जब शलभ नाश्ते के लिए डाइनिंग टेबल पर बैठा तो टेबल के मैट पर लगे एक बाल को देख उसने अपना आपा खो दिया। अब शलभ का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने नाश्ते की प्लेट को जमीन पर फेंक दिया। सुधा भी किचन से चाय लेकर दौड़ी दौड़ी आई। शलभ ने उससे गुस्से में कहा, "अगर तुमसे अपने बाल नहीं संभाले जाते तो इन्हें कटवा दो।"  सुधा जमीन पर फैले नाश्ते को साफ करने लगी। शलभ बिना नाश्ता करे ही ऑफिस जाने लगा। तभी सुधा चक्कर आ जाने से जमीन पर गिर पड़ी। सुधा को गिरता देख शलभ अवाक् रह गया और उसे लेकर तुरंत अस्पताल ले कर दौड़ा।

अस्पताल में सुधा के कुछ जरूरी टेस्ट किए गए। कुछ ही दिनों में सुधा की रिपोर्ट आ गई। सुधा की रिपोर्ट देखकर शलभ के पैरों के नीचे से ज़मीन सरक गई। सुधा तो कैंसर से जूझ रही थी। अपने कुंठित मन और हीन भावना के आक्रोश के आगे शलभ सुधा की सुध लेना ही भूल गया था। 

शलभ को अपनी गलतियों का एहसास हो रहा था। आत्मग्लानि उसे कचोट रही थी। आज उसे सुधा की कही बात याद आ रही थी, "जीवन साथी वह है जो जीवन भर साथ निभाए।" जिस सुधा ने मुझे  बिना किसी शर्त के अपनाया था, जिसे मेरे बालों के होने या ना होने से कोई अंतर नहीं पड़ता था। उसी सुधा से अपनी कुंठा के कारण उसके झड़ते बालों के लिए मैंने कितना कोसा और क्या क्या नहीं कहा? आज सुधा के गिरते स्वास्थ्य का कारण शलभ के सामने था।

वक्त इतना आगे बढ़ चुका था कि उसे वापस लाना किसी के हाथ में नहीं था। डॉक्टर की सलाह के मुताबिक सुधा का इलाज शुरू हुआ और उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। जब शलभ कुछ जरूरी सामान लेने घर लौटा तो उसने सुधा के बाल को तकिए पर पड़ा देखा। उसने आनन-फानन में सुधा का बाल मेज पर पड़ी अपनी किताब में रख दिया।

अब समय-समय पर सुधा को कीमोथेरेपी के लिए अस्पताल ले जाया जाता था। सुधा के जिन झड़ते बालों को लेकर शलभ  इतना क्रोधित होता था। आज कीमोथेरेपी के कारण उस के झड़ते बालों को देखकर शलभ आत्मग्लानि से भर गया था। 

अब शलभ अपनी कुंठा कब की भूल चुका था। उसे समझ में आ चुका था कि जीवन में यदि कुछ भी महत्वपूर्ण है तो वह स्वयं जीवन है और खासकर उसका जीवन जो आपका अपना हो। अब शलभ जीवन की सारी खुशियां सुधा को दे देना चाहता था। वह अपना ज्यादा से ज्यादा समय सुधा के साथ ही बिताता था। 

एक दिन शलभ ने अस्पताल में सुधा से कहा, "याद है तुमने मुझसे कहा था जीवनसाथी वह है जो जीवन भर साथ निभाए। तुम मुझे छोड़ कर कभी मत जाना मैं जीवन भर तुम्हारा साथ देना चाहता हूँ। मुझे मेरी सभी गलतियों के लिए माफ़ कर दो"

इस पर सुधा ने कहा, " ऐसे माफ़ी मत मांगिए। मैंने हमेशा ही आपके बिना कहे मेरे लिये आपकी परवाह महसूस की है। मैं खुद भी आपको आपकी कुंठा से बाहर निकालना चाहती थी। जीवन में शारीरिक सुंदरता से ज्यादा दिल की सुंदरता महत्व रखती है और आपका दिल बहुत बड़ा है। हां मैंने कहा था जीवनसाथी वही है जो जीवन भर साथ निभाए तो मुझे ऐसा जीवनसाथी मिला जिसने मेरा जीवन भर साथ निभाया।" यह कहते-कहते सुधा की आँखें हमेशा के लिए बंद हो गयी। 

अतीत की यादों में बहते बहते जैसे ही शलभ की आंखों से छलकते आंसू उसके हाथ पर गिरे वह वर्तमान में वापस आ गया। आज वही किताब उसके हाथ में थी जिसमें उसने सुधा का बाल रखा था। आज भी उसी एक बाल को हाथ में लिए शलभ सुधा की यादों में खो गया था। जो बाल शलभ की कुंठा का कारण थे जिसका वज्रपात वह समय-समय पर अपनी जीवनसंगिनी पर भी करता रहा, आज वही एक बाल शलभ को आत्म शक्ति दे रहा था। आज शलभ को अपने बालों के ना होने की कोई कुंठा नहीं थी यदि कुछ था तो एक खालीपन जिसको सुधा की यादों से भरता एक बाल


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