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नारी - एक चिंगारी ( Naari Ek Chingari)

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 एक चिंगारी नारी अभिमान की आवाज़ में कभी रीति में रिवाज़ में भक्ति है जो उस नारी को शक्ति जो उस चिंगारी को जितना भी उसे दबाओगे एक ज्वाला को भड़काओगे। उस अंतर्मन में शोर है बस चुप वो ना कमज़ोर है जितना तुम उसे मिटाओगे उतना मजबूत बनाओगे। बचपन में थामा था आंचल वो ही पूरक वो ही संबल तुम उसके बिना अधूरे हो तुम नारी से ही पूरे हो जितना तुम अहम बढ़ाओगे अपना अस्तित्व मिटाओगे। By- Dr.Anshul Saxena 

भांति भांति के लोग

 सब ज्ञान बांटने वाले, ज्ञानी नहीं हुए,
 सोच थोपने वाले,अभिमानी भरे हुए,
 सोच नहीं बदली , तो क्या हुए बड़े,
 देश बदल रहा है, तुम हो वहीं खड़े ।

कुछ दिखावटी ढोंगी, तो कुछ अज्ञान भरे,
अकल पे चलते औरों की, अपनी सोच परे,
 बे पेंदी के लोटे जैसे, कुछ हां में हां भरे ,
कुछ गूंगे कुछ बहरे कुछ मूंक रहें खड़े।

कोई गुणी कुछ अलग सोच,कुछ भी अलग करे,
लोगों की जलन ईर्ष्या,उस पर घात करे ,
हम नहीं तो तुम नहीं, कुछ ऐसी सोच लिए ,
आगे नहीं बढ़ने देंगे, आपस में रहें भिड़े ।

उम्र से बढ़कर अनुभव,जीवन का पाठ पढ़े,
वेद जानकर क्या होगा,ना वेदना जान सके।
पुरान खंडी रिवाजों का, बस हाहाकार करे,
नया नहीं सीखेंगे हम, उम्र बड़े तो बड़े ।

जो जानें हम वो बोले हैं,सुनने से ज्ञान बड़े,
 सुनने वाले कम मिलते हैं,वक्ता भरे पड़े।
सोच नहीं बदली , तो क्या हुए बड़े,
 देश बदल रहा है, तुम हो वहीं खड़े ।।
By:- Dr.Anshul Saxena 

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