बंटवारा



अंधेरे को गले लगाते
डरते हैं उजियारों से,
पीठ में खंजर घोंप रहे हैं
छुपे हुए गलियारों से।
आजादी आजादी करते
 सोच लिए गुलामों की,
सीमा पर दुश्मन बेहतर है
देश के इन गद्दारों से।।

मुल्क़ बाँटते शर्म छोड़कर
धर्म के नाम प्रचारों से,
अल्लाह मालिक वो ही बचाए,
ऐसे अक्ल के मारों से।
कौन से हक़ को मांग रहे हो,
हिंदुस्तान तुम्हारा है,
हिंदुस्तान को बांटने वालों
थके नहीं बटवारों से?

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