परवाह (Parvah)


आज संपूर्ण विश्व में कोरोना वायरस से फैला संक्रमण चिंता का विषय बना हुआ है। सुरक्षा की दृष्टि से देश भर में किये गये लॉक डाउन से कोई भूख से जूझ रहा है तो कोई अकेलेपन से जूझ रहा है। कोई व्यस्त है तो कोई खालीपन से जूझ रहा है। ऐसे में हम सभी दूर रहते हुए एकजुट रहकर यदि कुछ कर सकते हैं तो वह है परवाह।

तो इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत है आज की हिंदी कविता

 परवाह


यह जीवन रैन बसेरा है,
सुख दुख का यहां डेरा है,
मर कर तुम साथ चलो ना भले,
जीते जी साथ निभा देना।।

कहीं परिवारों का मेला है,
कोई अपना दूर अकेला है,
तुम पास भले ना जा पाओ,
पर दूर से साथ निभा देना।।

भावों में कोई बह जाए
तो तुम बाँध बना देना।।
तन से साथ रहो न भले,
पर मन से साथ निभा देना।।

कहीं तड़प है भूखे पेटों की,
कहीं कमी नहीं है नोटों की,
जिससे जितना बन पाये,
उन भूखों तक पहुंचा देना।।

मानवता की खेती का,
इस धरती पर जहाँ सूखा हो,
प्रेम दया के मेघों को,
उस धरती पर बरसा देना।।
Dr. Anshul Saxena

Comments

Abhinav Saxena said…
This comment has been removed by the author.
Abhinav Saxena said…
Emotional composition...keep it up.

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